Saturday, April 10, 2010

ज़िन्दगी ख़ाक बन कर है अब रह गई

ज़िन्दगी ख़ाक बन कर है अब रह गई
हर कदम पर है दिक्कतों कि दीवार
नफरतें बढती ही जा रही है यहाँ
अब तो दिखता नहीं कहाँ गया प्यार
उलझनें ही उलझनें हैं बाकी रहीं
कमनसीबी का आलम है चारो सहर
ढूंढता हैं हर कोई पल ख़ुशी का यहाँ
पर ग़म बरसा रहा है अपना कहर
आदमखोरी का सुरूर चढ़ने लगा
इंसां भी हलाली का बुत बन गया
सोचों में गर्द ही गर्द छाने लगी
कत्लेआम में नहीं है अब कोई हया
हो रहा ये क्यों किसी को पाता नहीं है
ज़िन्दगी अब सभी की सजा बन रही है
सुधरेंगे कभी ये हालाते गुलशन
ऐसी तो मुझे अब उम्मीद नहीं है

चारों ओर के शोर से

चारों ओर के शोर से
परेशानियों के जोर से
जब हार कर एक पनाह चाहता हूँ
तो खुद को अकेला पाता हूँ
इतना अकेला कि उस अकेलेपन में
खुद ही खो जाता हूँ
इसलिए निराश हूँ
उदास हूँ हताश हूँ

जब कभी मन करता है

जब कभी मन करता है
कि कुछ लिखूं
तब खुद को विषयहीन पाता हूँ
पर कभी कभी मन में विचारों का
ऐसा उद्वेलन होता है
कि मैं हैरान हो जाता हूँ
उनके प्रभाव को उस अनुभव को
शब्दों में परिभाषित नहीं कर पाता हूँ
फिर सोचता हूँ कि जब लिखता हूँ
तो उसका मतलब क्या होता है
मेरे मन का मंथन किसी को क्या देता है
तब सोचता हूँ कि लिखना बेकार है
पर ये कैसे भूल सकता हूँ मैं
कि लिखने से मुझे प्यार है
बस सिर्फ इसीलिए लिखता ही जा रहा हूँ
कैसी क्यों और किसके लिए लिख रहा हूँ
ये जानने में खुद को असमर्थ पा रहा हूँ

मैं और तुम

मैं और तुम
नदी के दो पार हैं
जो साथ तो रहते हैं
पर कभी मिल नहीं सकते
रेल की पटरियां हैं
जो दूसरों को तो मंजिल तक पहुँचाती है
पर खुद कभी एक नहीं हो सकती
भले ही हम-तुम आमने सामने हैं
पास हैं
पर दूरियाँ हमेशा बनी रहेगी
मैं तुमसे कुछ कह नहीं सकता
क्यों कि राह में लफ़्ज़ों के खो जाने का डर है
ऐसा होने से और कुछ नहीं बस यही होगा कि
मैं तोड़ इया जाऊँगा
और मैं जानता हूँ कि
टूटा हुआ खिलौना
बेकार हो जाता है

जाने क्या होता अगर

जाने क्या होता अगर
मुझे न लगी होती ठोकर
होता मैं वहां जहाँ से
मैं लौट पाता नहीं
राह तो खो ही चुकी थी
मंजिल भी खो जाती कहीं
आँधियों की धूल को साफ़ कर
जब खोली मैंने आँखें
पाया की खड़ा हूँ वीराने में
कोई नहीं था साथी कहीं भी
ऐसी कुछ भूल हो गयी थी
जाने अनजाने में
भटकते भटकते एक नदी मिल गई
धार ले गई वहां मुझे
जहां सभ्यता का निवास था
शायद पा जाऊँ लक्ष्य को अब
ऐसा होने लगा विश्वास था
भले न छू पाया शिखर को
पर हूँ जहां ऊँचा ही हूँ
बुझ जाता प्रकाश मेरे हृदय का
तो रवि भी तिमिर मिटा पाटा नहीं
राह तो खो ही चुकी थी
मंजिल भी खो जाती कहीं