Sunday, April 18, 2010

कितना कोमल एहसास है तुम्हारा

कितना कोमल एहसास है तुम्हारा
इसका एहसास तब होता है
जब तुम पास नहीं होती
तब जीवन की सारी कठोरता 
विकराल रूप ले सामने आती है
जिसका अँधियारा इतना भयंकर
कि उसमें दृष्टि शून्य हो जाती है 
तुम्हारा महत्त्व 
तुम्हारे न होने पर ही ज्ञात होता है
जब तुम समीप होती हो
मैं स्थिर होता हूँ
विषमताएँ जितनी भी बढ़ जायें 
मैं साहस न खोता हूँ 
तुम्हारे दूर जाते ही 
मैं जैसे असहाय हो जाता हूँ
बाधाएं मुझे अधीर बना देती हैं
मेरा शक्ति पुंज बुझ जाता है
मेरा तेज मंद पड़ जाता है
तुम मेरी अभयता का स्त्रोत हो
प्रेम और दृढ विश्वास से
कर देती मुझे ओतप्रोत हो
अतः जब भी युद्ध की घड़ी आये
प्रिय! अपने हाथों में मुझे
तुम्हारा हाथ चाहिये 
जीवन की इस लम्बी बीहड़ यात्रा में
संगिनी! मुझे तुम्हारा साथ चाहिये 

सृजन अभी होने को था

सृजन अभी होने को था
की प्रलय प्रखर हो बरस गया
जिसने सागर को जन्म दिया
खुद दो बूंदों को तरस गया
प्रकृति नियम से वशीभूत है
हर उदभव पर विनाश छिपा
हर जीवन के मनस पटल पर
है मृत्यु का श्लोक लिखा
यदि जन्म लिया तो सृजन करो
इस धरती में श्रृंगार भरो
पीड़ा से प्राण निकलते हैं
इस धरती के, सब त्रास हरो
है समय बहुत ही अल्प
कल्प का तरु न सदा हरा रहता
जिसने क्षण, कण का मान न माना
उसका भाग्य न कभी खरा रहता

तेरी चमकती हुई आँखों में मुझे

तेरी चमकती हुई आँखों में मुझे
एक धुंधली-सी तस्वीर नज़र आती है
देखे हैं रातों को जगकर जो मैंने
उन ख्वाबों की ताबीर नज़र आती है
जब भी उलझता हूँ कहीं
और राह कोई मिलती नहीं
हर उलझनों से निकलने की
तदबीर नज़र आती है
गिरने को होता हूँ खा के ठोकरें
जब चोट लगती है मुझे
हर ठोकरें सम्हाल ले
वो जंजीर नज़र आती है
फिरता हूँ जब अंधेरों में
खो जाते सारे रास्ते
तेर दमकते नूर में
मेरी तकदीर नज़र आती है
उठते हैं जब कदम गलत
ईमान से नाता जब टूटता
तेरी टेढ़ी भौंहों सी तलवार
सीने को जो दे चीर, नज़र आती है
लड़ने का मुझमें जो हौसला
हसरत है जो ये जीत की
इस ताक़त के पीछे मुझको तो
तेरी खुशबू से भरी हुई समीर नज़र आती है

रंग गया हर कोई आज मस्ती के रंग में

रंग गया हर कोई आज मस्ती के रंग में
बदल गयी चालें सबकी, रमे सब अपने ही ढंग में
कल थी जली बुराई आज अच्छाई कि धूम है
निखरे निखरे लगते सारे चेहरे मासूम हैं
बसंती हवा झूम-झूम गीत गा रही है
सोंधी-सोंधी खुशबू दिल की हलचल बढ़ा रही हैं
मिट गई सब दूरियाँ बरसता सब दूर प्यार है
मौसम ये ऐसा कि अन्दर बाहर हर जगह बहार है
कहीं महकती भाँग तो कहीं बहकती फाग
मजबूर हो गए झूमने को ऐसा है ये राग
भूलें गंदी राजनीति भूलें गंदे माहौल को
कर दें धराशायी अमन के दुश्मनों की चाल को
आओ इस होली में हम सब प्यार का रंग लगायें
ऐसा जो सदियों तक रिश्तों को रंगीन बनाएं

जाने क्यों सब कुछ रुका हुआ-सा है

जाने क्यों सब कुछ रुका हुआ-सा है
आज आसमान दिखता थोडा झुका झुका सा है
फैला हुआ है हर दिशा में खामोश अँधेरा
खुशियों का दिया शायद बुझा-बुझा-सा है
आज फिर दिल तेरे तसव्वुर को तरसता है
आज फिर दिल तेरी याद में सुलगता-सा है
आज बड़ी देर से सोकर जागा हूँ मैं
आँखों में रात का सपना अब तक कसकता-सा है
सोचा है तेरी याद में हम भी ताजमहल बनायेंगे
तेरी खुशबू से मेरा आलम अब तक महकता-सा है
जाना कहाँ था और कहाँ जा रहा हूँ मैं
मैं या तो फिर ये रस्ता बहकता सा है