अक्षर जब शब्द न बन पायें
शब्द जब आपस में ही उलझ जाएँ
जब कोई बात भीतर ही घुट जाए
आँख तब जुबां का काम करती हैं
खिलते मुरझाते रोते मुस्कुराते
दिल की हकीक़त को बयान करती हैं
Monday, April 26, 2010
मेरी आँखों के सामने
मेरी आँखों के सामने
गुज़रा ज़माना बैठा है
जिस्म की सिलवटों से बयाँ होता
एक फ़साना बैठा है
फ़साना
जो कल तक हलचलों से भरा था
हरा था
जो नदिया की कलकल धारा था
जिसने कल को सँवारा था
आज
फर्श पर गिरे पानी-सा हो गया है
बहुत थक गया था
जैसे अब सो गया है
धीरे धीरे उसका फैलाव
सिकुड़ता जा रहा है
उसका असीमित विस्तार
अपने में ही समा रहा है
पर उस ठहरे हुए पानी में अब भी
थोड़ी-सी हलचल बाकी है
होंठों के चौड़ा होने को
बस इतना सा कारण काफी है
गुज़रा ज़माना बैठा है
जिस्म की सिलवटों से बयाँ होता
एक फ़साना बैठा है
फ़साना
जो कल तक हलचलों से भरा था
हरा था
जो नदिया की कलकल धारा था
जिसने कल को सँवारा था
आज
फर्श पर गिरे पानी-सा हो गया है
बहुत थक गया था
जैसे अब सो गया है
धीरे धीरे उसका फैलाव
सिकुड़ता जा रहा है
उसका असीमित विस्तार
अपने में ही समा रहा है
पर उस ठहरे हुए पानी में अब भी
थोड़ी-सी हलचल बाकी है
होंठों के चौड़ा होने को
बस इतना सा कारण काफी है
जाड़ा यूँ लगता है जैसे
जाड़ा
यूँ लगता है जैसे
हर जगह छा गया है
कँपाता, हड्डियों को गलाता
अंतर में समाया गया है
रिश्तों में भी मौसम होते हैं
बदलते हैं मिजाज़ गुज़रते वक़्त के साथ
कल तक उनमें थी बहार
था प्यार
पर ठंडक ने वहाँ भी घर कर लिया है
अपने दम से
बाहों को सिकुड़ने पर
मजबूर कर दिया है
यूँ लगता है जैसे
हर जगह छा गया है
कँपाता, हड्डियों को गलाता
अंतर में समाया गया है
रिश्तों में भी मौसम होते हैं
बदलते हैं मिजाज़ गुज़रते वक़्त के साथ
कल तक उनमें थी बहार
था प्यार
पर ठंडक ने वहाँ भी घर कर लिया है
अपने दम से
बाहों को सिकुड़ने पर
मजबूर कर दिया है
तमन्नाएं दिल में आती क्यों है
तमन्नाएं दिल में आती क्यों है
आकर बेचारे को सताती क्यों है
रंजो गम कि महफ़िल में
वैसे भी अकेला है
बर्फीली आग से इसे जलाती क्यों है
आकर बेचारे को सताती क्यों है
रंजो गम कि महफ़िल में
वैसे भी अकेला है
बर्फीली आग से इसे जलाती क्यों है
गुलशन में देख गुल-चहर
गुलशन में देख गुल-चहर
दिल गुल-ए-गुलज़ार हो गया
मैं गुलफाम का अपनी
गुल फिशानी बयाँ करूँ तो करूँ कैसे
वक्त ही कहाँ है
देखो, गुरूब का करार हो गया
दिल गुल-ए-गुलज़ार हो गया
मैं गुलफाम का अपनी
गुल फिशानी बयाँ करूँ तो करूँ कैसे
वक्त ही कहाँ है
देखो, गुरूब का करार हो गया
Subscribe to:
Posts (Atom)