Friday, April 30, 2010

बीता हुआ लम्हा कभी गुज़रता नहीं है

बीता हुआ लम्हा कभी गुज़रता नहीं है
यादों का सैलाब कभी ठहरता नहीं है
एक लहर-सी उठती है जब तब दिल में
डूबी हुई घड़ियाँ दिखती हैं
गुज़रे कल के साहिल में
एक ठंडी सिहरन सर से पाँव तक दौड़ जाती है
'कल' से आज को, आज से 'कल' को जोड़ जाती है
आखिर हम जो आज हैं
उसकी नींव कल ही तो पड़ी थी
भले ही निकल पड़े हो नई क़ी तलाश में
कल तो ज़िन्दगी पुरानी मंजिल पर ही खड़ी थी
वैसे भी क्या पता
इस दुनिया में कब 'कल' ही 'कल' बन जाये
जिस बाने को समेट कर रख चुके हैं
वो फिर से तन जाये 
इसलिए बीते लम्हों को गुज़रा हुआ मत मानों
यादों में हलचल है उन्हें ठहरा मत जानों
जिससे, गर ज़िदगी फिर से
उसी मोड़ पर ले आये
तो 'कल' जो बिगड़ गया था
'कल' वो सँवर जाये 

माना अभी धुंधला सवेरा है

माना अभी धुंधला सवेरा है
काले बादलों ने सूरज को घेरा है
इससे सूरज बुझा तो नहीं है
आग उसमें बाकी है अभी
किरणों का राग बाकी है अभी
बस,
हवा के एक झोंके क़ी दरकार है
ये तो सब को पता है कि
हवा, बादल कि सबसे पुरानी तकरार है
रुको मत, झुको मत, निराश मत हो
पवन वेग से आता ही होगा
रखो भरोसा वो झोली में अपनी
उपहार प्रकाश का लाता ही होगा

पहला प्यार

पहला प्यार
पड़ोस से चलने लगती है ठंडी-ठंडी बयार
अच्छा लगने लगता है
छत पर खड़े हो करना घंटो इंतज़ार
अचानक ही
सारा मोहल्ला ख़ूबसूरत लगने लगता है
जैसे मोहल्ला न हुआ फूलों का बाग़ हो गया
सुरमई वीणा से निकला, मध्यम राग हो गया
होने लगती है अपने कपड़ों कि, बालों कि फ़िक्र
एक सिरहन-सी दौड़ जाती है बदन में
जो कहीं हो उसका जिक्र
नज़रें खुद को बचाने लगती हैं
दोनों के घरवालों से
दिल भर जाता है उलझनों से
अजीब से सवालों से
हाय,
वो ठंडी आहें, महबूब के घर की राहें
मंजिल की राह बन जाती हैं
और उन राहों पर जो एक बार नज़र जम जाती है
तो भूल जाता है सारा संसार
ऐसा होता है पहला प्यार

Wednesday, April 28, 2010

माँ देख !

माँ देख !
ये ज़माने वाले मुझे तंग करते हैं
अपने उलझन भरे सवालों से
मुझे दंग करते है
बिना वजह इधर-उधर दौडाते हैं
तरह तरह से के गम देते हैं डराते हैं
मैं रातों को सोता नहीं हूँ
दिन में जाग नहीं पाता
हर रास्ते में अकेला चलता हूँ
कोई साथ नहीं आता
देखो तो,
पाँव में छाले पड़ गये हैं
कोई मरहम नहीं लगाता
मुझे गर छींक भी आ जाती
तो तू परेशान हो जाती थी
तरह-तरह दवाएँ देती
अपने पहलू में सुलाती थी
भीतर से भी बाहर से भी
तू मुझे साफ़ रखती थी
मैं कहीं खो न जाऊं, इसलिए हमेशा अपने साथ रखती थी
पर अब मैं मैला हो गया हूँ, खो गया हूँ
चेहरे पर धुल, कालिख जम गयी है
तन गीला है गर्म सुर्ख़ पसीने से
अजीब सी गंध आती है खुद के जीने से
अपनी इस हालत के कारण मन आईना देखने से डरता है
और कुछ नहीं अब बस
तेरा आँचल ओढ़कर सोने को जी करता है
मुझे सुला दे, मेरी थकान मिटा दे
मुझे साफ़ कर दे फिर से
दुनिया ने दिए हैं जो निशान
सारे मिटा दे

लरजते होंठों से

लरजते होंठों से
तुमने जब भी कुछ कहा
वो अफसाना
ज़िन्दगी का फलसफा बन गया
जैसे
ईंट-ईंट जुड़कर ईमारत बनती है
लफ्ज़-लफ्ज़ गढ़कर इबारत बनती है
तुम्हारे एहसास ने
वैसे ही
मेरी बदहाल शख्सियत को
एक भरपूर आकार दे दिया
एक पनाह को अब तक
भटकता था यहाँ वहां
साए में आ तुम्हारे
बदन आराम पा गया
एक बूँद को तरसती थी वो तल्ख़ रूह जो
तर कर दे जो जहाँ को
उसे वो प्यार दे दिया