Friday, April 30, 2010

उन दिनों के हवा होने पर

उन दिनों के हवा होने पर
जब महफ़िलों में हमारा रसूख था
तन्हाई को भी जीने का
अंदाज़ हमारा क्या खूब था
खुद को ही दो हिस्सों में बात लेते थे
खुद से ही बहस कर वक़्त काट लेते थे
अपनी ही किसी बात पर ठहाका मार कर
आईने के सामने खुद के लिए खुद को संवार कर
अकेले ही ज़िन्दगी क़ी सैर पर निकल जाते थे
हमारी ज़िन्दादिली देख
पत्थरों के दिल भी पिघल जाते थे
तस्वीरों के लिए ख़त लिखते
पढ़कर उन्हें सुनाते थे
ख्यालों क़ी ईंटों से हकीक़त का सपना बनाते थे
वो मीठी-सी ख़ामोशी
व तन्हाई का आलम
अब याद बहुत आता है
ज़िन्दगी का शोर, चारो ओर जमी भीड़ का जोर
आँखों क़ी कोरों में पानी ले आता है 

मैं अब खुद क्या कहूँ

मैं अब खुद क्या कहूँ
कवि !
तुमने तो
मेरे भीतर के सारे भाव चुरा लिए
जिन शब्दों के आभूषण पहना
मैं अपने भावों को सजाना चाहता था
इन्हें तुमने पहले ही
जग के पटल पर चस्पा कर दिया
मैंने जब ये सब देखा
तब अंतर में एक ही प्रश्न उभरा
तुम तो कवि थे
चोर कब से हो गये ?

बीता हुआ लम्हा कभी गुज़रता नहीं है

बीता हुआ लम्हा कभी गुज़रता नहीं है
यादों का सैलाब कभी ठहरता नहीं है
एक लहर-सी उठती है जब तब दिल में
डूबी हुई घड़ियाँ दिखती हैं
गुज़रे कल के साहिल में
एक ठंडी सिहरन सर से पाँव तक दौड़ जाती है
'कल' से आज को, आज से 'कल' को जोड़ जाती है
आखिर हम जो आज हैं
उसकी नींव कल ही तो पड़ी थी
भले ही निकल पड़े हो नई क़ी तलाश में
कल तो ज़िन्दगी पुरानी मंजिल पर ही खड़ी थी
वैसे भी क्या पता
इस दुनिया में कब 'कल' ही 'कल' बन जाये
जिस बाने को समेट कर रख चुके हैं
वो फिर से तन जाये 
इसलिए बीते लम्हों को गुज़रा हुआ मत मानों
यादों में हलचल है उन्हें ठहरा मत जानों
जिससे, गर ज़िदगी फिर से
उसी मोड़ पर ले आये
तो 'कल' जो बिगड़ गया था
'कल' वो सँवर जाये 

माना अभी धुंधला सवेरा है

माना अभी धुंधला सवेरा है
काले बादलों ने सूरज को घेरा है
इससे सूरज बुझा तो नहीं है
आग उसमें बाकी है अभी
किरणों का राग बाकी है अभी
बस,
हवा के एक झोंके क़ी दरकार है
ये तो सब को पता है कि
हवा, बादल कि सबसे पुरानी तकरार है
रुको मत, झुको मत, निराश मत हो
पवन वेग से आता ही होगा
रखो भरोसा वो झोली में अपनी
उपहार प्रकाश का लाता ही होगा

पहला प्यार

पहला प्यार
पड़ोस से चलने लगती है ठंडी-ठंडी बयार
अच्छा लगने लगता है
छत पर खड़े हो करना घंटो इंतज़ार
अचानक ही
सारा मोहल्ला ख़ूबसूरत लगने लगता है
जैसे मोहल्ला न हुआ फूलों का बाग़ हो गया
सुरमई वीणा से निकला, मध्यम राग हो गया
होने लगती है अपने कपड़ों कि, बालों कि फ़िक्र
एक सिरहन-सी दौड़ जाती है बदन में
जो कहीं हो उसका जिक्र
नज़रें खुद को बचाने लगती हैं
दोनों के घरवालों से
दिल भर जाता है उलझनों से
अजीब से सवालों से
हाय,
वो ठंडी आहें, महबूब के घर की राहें
मंजिल की राह बन जाती हैं
और उन राहों पर जो एक बार नज़र जम जाती है
तो भूल जाता है सारा संसार
ऐसा होता है पहला प्यार