Friday, April 30, 2010

ये सच की तुम दूर हो

ये सच की तुम दूर हो
सच नहीं है
मैं हर पल तुम्हें अपनी साँसों के पास पाता हूँ
हाथ बढाऊँ तो छू ही लूं
पर ये सोचकर ठिठक जाता हूँ
छू दूं कहीं तुम मैली न हो जाओ
कुछ फासला ही सही
पर सामने तो हो
सब कुछ लुटा के पाया है तुमको
कहीं बिछड़ न जाओ
पर तुम मुझसे बिछडोगे कैसे
तब मैं खुद से जुदा हो जाऊँगा
धडकनों के बिना शायद कुछ पल मैं जी भी लूं
लेकिन तुम्हारे बिना...
तुम्हारे बिना पल भर में मर जाऊँगा

हे कवि !

हे कवि !
मेरे अक्षरों की
आड़ी तिरछी रेखाओं के बीच
तुम्हारी रचनायें
वैसे ही हैं जैसे
गंदले तालाब में खिली हुई कुमुदनी
मेरे शब्दों के तंग खाको के बीच
तुम्हारी उपस्थिति 
उन्हें व्यापकता प्रदान करती है 
मेरे विचारों में दुराव था
या शायद शब्दों का अभाव था
किन्तु तुम्हारा सानिध्य पा
मैं भी मुखर उठा हूँ
जानता हूँ तुम जैसा नहीं बन सकता
फिर भी प्रयास में जुटा हूँ 

कभी-कभी ऐसा क्यों लगता है

कभी-कभी ऐसा क्यों लगता है
कि किसी अपने के पहलू में
खुद को छुपाकर
दुनिया को भुला दे
भूल जायें साँसें लेना
धडकनों की भी आवाज़ मिटा दें
क्यों लगने लगता है ज़रूरी
जिंदा होने के एहसास के लिया
की ज़िन्दगी का कोई निशाँ न रहे
कुछ पल के लिए
घुल जायें हवाओं में
अपनी कोई पहचान न रहे

उन दिनों के हवा होने पर

उन दिनों के हवा होने पर
जब महफ़िलों में हमारा रसूख था
तन्हाई को भी जीने का
अंदाज़ हमारा क्या खूब था
खुद को ही दो हिस्सों में बात लेते थे
खुद से ही बहस कर वक़्त काट लेते थे
अपनी ही किसी बात पर ठहाका मार कर
आईने के सामने खुद के लिए खुद को संवार कर
अकेले ही ज़िन्दगी क़ी सैर पर निकल जाते थे
हमारी ज़िन्दादिली देख
पत्थरों के दिल भी पिघल जाते थे
तस्वीरों के लिए ख़त लिखते
पढ़कर उन्हें सुनाते थे
ख्यालों क़ी ईंटों से हकीक़त का सपना बनाते थे
वो मीठी-सी ख़ामोशी
व तन्हाई का आलम
अब याद बहुत आता है
ज़िन्दगी का शोर, चारो ओर जमी भीड़ का जोर
आँखों क़ी कोरों में पानी ले आता है 

मैं अब खुद क्या कहूँ

मैं अब खुद क्या कहूँ
कवि !
तुमने तो
मेरे भीतर के सारे भाव चुरा लिए
जिन शब्दों के आभूषण पहना
मैं अपने भावों को सजाना चाहता था
इन्हें तुमने पहले ही
जग के पटल पर चस्पा कर दिया
मैंने जब ये सब देखा
तब अंतर में एक ही प्रश्न उभरा
तुम तो कवि थे
चोर कब से हो गये ?