Wednesday, April 28, 2010

माँ देख !

माँ देख !
ये ज़माने वाले मुझे तंग करते हैं
अपने उलझन भरे सवालों से
मुझे दंग करते है
बिना वजह इधर-उधर दौडाते हैं
तरह तरह से के गम देते हैं डराते हैं
मैं रातों को सोता नहीं हूँ
दिन में जाग नहीं पाता
हर रास्ते में अकेला चलता हूँ
कोई साथ नहीं आता
देखो तो,
पाँव में छाले पड़ गये हैं
कोई मरहम नहीं लगाता
मुझे गर छींक भी आ जाती
तो तू परेशान हो जाती थी
तरह-तरह दवाएँ देती
अपने पहलू में सुलाती थी
भीतर से भी बाहर से भी
तू मुझे साफ़ रखती थी
मैं कहीं खो न जाऊं, इसलिए हमेशा अपने साथ रखती थी
पर अब मैं मैला हो गया हूँ, खो गया हूँ
चेहरे पर धुल, कालिख जम गयी है
तन गीला है गर्म सुर्ख़ पसीने से
अजीब सी गंध आती है खुद के जीने से
अपनी इस हालत के कारण मन आईना देखने से डरता है
और कुछ नहीं अब बस
तेरा आँचल ओढ़कर सोने को जी करता है
मुझे सुला दे, मेरी थकान मिटा दे
मुझे साफ़ कर दे फिर से
दुनिया ने दिए हैं जो निशान
सारे मिटा दे

लरजते होंठों से

लरजते होंठों से
तुमने जब भी कुछ कहा
वो अफसाना
ज़िन्दगी का फलसफा बन गया
जैसे
ईंट-ईंट जुड़कर ईमारत बनती है
लफ्ज़-लफ्ज़ गढ़कर इबारत बनती है
तुम्हारे एहसास ने
वैसे ही
मेरी बदहाल शख्सियत को
एक भरपूर आकार दे दिया
एक पनाह को अब तक
भटकता था यहाँ वहां
साए में आ तुम्हारे
बदन आराम पा गया
एक बूँद को तरसती थी वो तल्ख़ रूह जो
तर कर दे जो जहाँ को
उसे वो प्यार दे दिया

Monday, April 26, 2010

अनवरत

अनवरत
सूरज का आना
रोशनी फैलाना
अनवरत
चाँद का चमकना
तारों का दमकना
अनवरत
पवन का बहाव
अपनों से मन का जुड़ाव
अनवरत
धरती का घूमना
लहरों का तट को चूमना
प्रकृति का दान है
अनवरत
जीवन का गान है

रात बीती

रात बीती
हुआ सवेरा
सूरज आया लेकर अपना डेरा
डेरे में उसके अजब चीज़ों का कूला
देख उन्हें मन मेरा ख़ुशी से फूला
अंधियारे को मिटाने
छम छम करती आई अंशुला
फूल खिल गए
किरणों को गर्मी से
बुतकदे पिघल गए
खुशबू भरी बयार चलने लगी
सुबह की लाली
सुनहरी रोशनी में ढलने लगी
कल का थका हुआ मुसाफिर
ताज़ा हो मंजिल की तरफ चला
ताजगी की चाबी से
मंजिल का ताला खुला
मंजिल की राह दिखाने आई
अंशुला

कविता दे देती है

कविता दे देती है
खूबसूरती को एक ज़बान
कविता बना देती है
मूक पत्थर को इंसान
कविता छूकर बना देती है
मिटटी को सोना
कविताओं में समा जाते भाव सारे
हँसाना हो या रोना
कविता नहीं
महज शब्दों का प्रसार है
कोमल भावनाओं का
कविता ही एक हथियार है
कविता ही तो है ये जीवन
मृत्यु का भी कविता ही श्रृंगार है
कविता की सीमा नहीं कोई
इसका विस्तार अपार है