ज़िन्दगी में संघर्ष कब बीतता है
इस युद्ध में बस वही जीतता है
जो भले ही गिरे बार बार लगातार
झोंक के खुद को जो फिर खड़ा हो एक बार
कील भी दीवार में ठुकती नहीं एक बार में
जीत पाना बस यूँ ही मुश्किल बड़ा संसार में
जो कुछ भी मिलता है सहज
वह जय नहीं संजोग है
जूझने वाला ही बस होता सुयश के योग्य है
डूब जाता है ये मन तन छोड़ता है साथ
रोड़े लगते सब यहाँ न थामे कोई हाथ
ताने सुने फब्ती सहे और सहे परिहास
पर सुप्त न हो लुप्त न हो कर सके अट्टहास
बस वही है जीतता यह अपरिमित युद्ध
जो हार के कीचड़ में भी सन कर है रहता शुद्ध!!!!!!
Saturday, May 8, 2010
Wednesday, May 5, 2010
जन्मदिन
जन्मदिन
मौका है जश्न का या मातम का,
ये कभी समझ नहीं पाया
जश्न इस बात का की तमाम मुश्किलों,परेशानियो,
अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगाने वाली परिस्थितियों के बावजूद
कायम हैं,
या फिर मातम
की मौत की तरफ एक जीना और चढ़ गए...
जन्मदिन ही क्यों,
ज़िन्दगी के मायने भी क्या समझ पाया है कोई???
कभी जैसे गर्मी की छुट्टियों में बिना आरक्षण
ढेरो सामान के साथ
हिन्दुस्तानी रेल में एक जगह से दूसरी जगह का लम्बा सफ़र
कभी जैसे हवाई झूले का उतर चढ़ाव
जिसमे चीख डर से निकलती है या उत्साह से
ये खुद को भी मालूम नहीं होता!!!!!!
मौका है जश्न का या मातम का,
ये कभी समझ नहीं पाया
जश्न इस बात का की तमाम मुश्किलों,परेशानियो,
अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगाने वाली परिस्थितियों के बावजूद
कायम हैं,
या फिर मातम
की मौत की तरफ एक जीना और चढ़ गए...
जन्मदिन ही क्यों,
ज़िन्दगी के मायने भी क्या समझ पाया है कोई???
कभी जैसे गर्मी की छुट्टियों में बिना आरक्षण
ढेरो सामान के साथ
हिन्दुस्तानी रेल में एक जगह से दूसरी जगह का लम्बा सफ़र
कभी जैसे हवाई झूले का उतर चढ़ाव
जिसमे चीख डर से निकलती है या उत्साह से
ये खुद को भी मालूम नहीं होता!!!!!!
Friday, April 30, 2010
उड़ चुकी है नींद अब ख्वाबो के जोर से
उड़ चुकी है नींद अब ख्वाबो के जोर से,
एक आवाज़ आती है जाने किस ओर से!
खिल रही थी धुप अब तक आसमानों में,
घिर गए सहसा ये बदल घनघोर से!
फिर रहे थे लेकर दुनिया बाज़ुओ में हम,
आज पर पड़ने लगे है कमज़ोर से!
चीख को कैसे सुरों का नाम दे दू अब,
महफिले सजती है मरघट के छोर से!
हाथ में अंगार लेकर रौशनी की है,
कुछ मशाले आ रही है उस मोड़ से!
एक आवाज़ आती है जाने किस ओर से!
खिल रही थी धुप अब तक आसमानों में,
घिर गए सहसा ये बदल घनघोर से!
फिर रहे थे लेकर दुनिया बाज़ुओ में हम,
आज पर पड़ने लगे है कमज़ोर से!
चीख को कैसे सुरों का नाम दे दू अब,
महफिले सजती है मरघट के छोर से!
हाथ में अंगार लेकर रौशनी की है,
कुछ मशाले आ रही है उस मोड़ से!
कल जब मैंने अपने दिल से पूछा
कल जब मैंने अपने दिल से पूछा
कि वो तुम्हें इतना प्यार
आखिर करता क्यों है
मेरे दिल ने मुझ पर ही
सवाल दाग दिया
कहने लगा
सूरज क्यों देता है रोशनी
हवाओं में क्यों ज़िन्दगी है
तितली में क्यों रंग हैं होते
ज़माने में क्यों बंदगी है
झरना क्यों बहता रहता है
सागर में क्यों लहरें है
जहाँ भर के दर्द मिटाते
क्यों मासूम चेहरे हैं
कि वो तुम्हें इतना प्यार
आखिर करता क्यों है
मेरे दिल ने मुझ पर ही
सवाल दाग दिया
कहने लगा
सूरज क्यों देता है रोशनी
हवाओं में क्यों ज़िन्दगी है
तितली में क्यों रंग हैं होते
ज़माने में क्यों बंदगी है
झरना क्यों बहता रहता है
सागर में क्यों लहरें है
जहाँ भर के दर्द मिटाते
क्यों मासूम चेहरे हैं
तुमने कभी देखा है
तुमने कभी देखा है
अपनी आँखों को
मेरी आँखों के आईने में
वो बोलती हैं, हँसती है
चमकती है
जैसे दूर कहीं अँधेरे में
दो दीये झिलमिला रहे हों
जिनकी चमक से मुझमें उजाला है
मैंने देखा है
वो बाहें खोल बुलाती है
खुद में डूबा लेने को
सागर से भी ज्यादा गहराई में
समां लेने को
तुम्हारी आँखों में क्या है
ये शायद तुम भी नहीं जानती
जानना चाहोगी
आना
देखना कभी अपनी आँखों को
मेरी आँखों के आईने में
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